बलिया में धूम धाम से मनाई गई संत शिरोमणि रविदास जी की 108 वीं जयंती।

संत रविदास जयंती रविवार को हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। काशी में जन्मे रविदास (रैदास) का समय 1482-1527 ई. के बीच हुआ माना जाता है। हर साल माघ मास की पूर्णिमा तिथि पर इनकी जयंती मनाई जाती है। जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था। रविदास जी ने एक व्यक्ति को एक कौड़ी दी और कहा कि इसे गंगा नदी को अर्पित कर देना, व्यक्ति ने जैसे ही वह कौड़ी गंगा को अर्पित की तो वहां देवी प्रकट हो गईं  !

बेगूसराय- हरेराम दास/कृष्णनंदन सिंह:- बिहार के बेगूसराय जिले में रविवार को बलिया प्रखंड परिसर स्थित अंबेडकर पार्क में जिला स्तरीय संत शिरोमणि रविदास जयंती अखिल भारतीय रविदास महासंघ शाखा बलिया के द्वारा संत शिरोमणि रविदास जी की 108वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई। जहां कार्यक्रम की अध्यक्षता राकेश दास ने किया जबकि मंच का संचालन उमेश दास कर रहे थे। वही बेगूसराय में बलिया प्रखंड स्थित अंबेडकर पार्क में संत शिरोमणि रविदास जयंती पखवारा का आयोजन किया गया। बलिया प्रखंड क्षेत्र के सैकड़ों रविदास के अनुयाई उपस्थित थे। अम्बेडकर पार्क में आयोजित कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि लोजपा के प्रदेश महासचिव सुरेंद्र विवेक ने  फीता काटकर किया। इस दौरान मौजूद लोगों ने संत रविदास की प्रतिमा पर जहां पुष्प अर्पित किया वहीं बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। आयोजकों ने इस मौके पर गरीब वंचित बच्चों के बीच किताब कॉपी का भी वितरण किया। लोगों ने संत रविदास को याद करते हुए उनके बताए रास्ते पर चलने का भी संकल्प लिया।
संत रविदास से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं :-
इनकी कथाओं का संदेश यही है कि अगर हमारा मन पवित्र है तो हमें भगवान की विशेष कृपा मिलती है। रविदासजी जूते बनाने का काम करते थे। उनसे जुड़ी प्रचलित कथा के अनुसार एक दिन उनके पास एक व्यक्ति आया, उसने कहा कि मेरा जूता फट गया है, इसे जल्दी सही कर दो, मुझे गंगा स्नान के लिए जाना है। वह रविदासजी के भक्ति भाव से परिचित नहीं था। संतश्री ने उस व्यक्ति के जूते सही कर दिए। व्यक्ति ने एक कौड़ी देते हुए कहा कि ये लो तुम्हारी मेहनत का दाम। रविदासजी ने कहा कि आप गंगा नदी तक जा ही रहे हैं तो ये कौड़ी मेरी ओर से मां गंगा को अर्पित कर देना।
व्यक्ति ठीक है बोलकर गंगा नदी की ओर चल दिया। कुछ ही देर में वह नदी पहुंच गया और नदी में स्नान के बाद वह बाहर आ गया। कुछ देर बाद उसे याद आया कि रविदास की एक कौड़ी नदी को अर्पित करनी है। उसने कहा कि हे गंगा मां ये कौड़ी रविदास ने अर्पित करने के लिए कहा है। ये कहते है वहां देवी गंगा प्रकट हुईं और कहा कि ये कौड़ी मुझे दे दो। देवी ने भेंट स्वरूप सोने और रत्नों से बना एक कंगन उस व्यक्ति को दिया और कहा कि ये रविदास को दे देना। व्यक्ति कुछ समझ नहीं पा रहा था। वह कंगन लेकर वहां से चल दिया। रास्ते में उसने सोचा कि इस कंगन के बारे में रविदास को कुछ नहीं बोलूंगा तो उसे कुछ मालूम नहीं होगा। मैं ये कंगन राजा को दे देता हूं, राजा से उपहार में स्वर्ण मुद्राएं मिल जाएंगी। ये सोचकर वह व्यक्ति राजमहल पहुंच गया और राजा को कंगन भेंट में दे दिया। राजा ने उसे फलस्वरूप बहुत सारा धन दे दिया। धन लेकर व्यक्ति अपने घर की ओर लौट गया।
बहुत सोचने के बाद वह रविदास के पास पहुंचा और पूरी बात बता दी। उसने अपने किए गलत काम के लिए क्षमा भी मांगी। रविदास ने कहा कि अगर तुम मुझे पहले बता देते तब भी मैं वह कंगन तुम्हें ही दे दता, मुझे धन का कोई लोभ नहीं है। दूसरे कंगन के लिए मैं मां गंगा से प्रार्थना करूंगा, ताकि तुम्हारा संकट दूर हो सके। रविदासजी ने अपनी कठौती, जिसमें चमड़ा गलाने के लिए पानी भरते थे, उसमें ही मां गंगा का आव्हान किया। देवी गंगा वहां प्रकट हुईं रविदास को एक और कंगन दे दिया। संत रविदास ने वह कंगन उस व्यक्ति को दे दिया। इसी के बाद ये कहावत बनी कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।
प्रसंग की सीख
इस प्रसंग की सीख यह है कि अगर हमारा मन पवित्र होगा तो हमें भगवान की विशेष कृपा मिल सकती है। पवित्र मन की वजह से रविदास के एक आव्हान पर देवी गंगा उनके सामने तुरंत प्रकट हो गई थीं।

मौके पर कार्यक्रम के उद्घाटन करता श्री विवेक ने अंबेडकर पार्क स्थित बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हुए कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किए वही कार्यक्रम में शिरकत करने वाले सभी मंचासीन अतिथियों को स्वागत करते हुए गुलदस्ता भेंट किया गया। जहां मौके पर कार्यक्रम में जदयू नेता मृत्युंजय कुमार, भाजपा के पूर्व मंडल अध्यक्ष अनिल कुमार, बड़ी बलिया उत्तरी पंचायत के मुखिया रेखा देवी, साहेबपुर कमाल प्रखंड के चौकी मुखिया रामप्रवेश पासवान, माले नेता इंद्रदेव राम, श्रीराम दास, सिकंदर दास, नंद देव कुमार, उमेश दास , दिनेश कुमार, मनोज दास, गणपत महतो, समेत अन्य लोग उपस्थित थे।

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